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Tuesday, December 4, 2018

आस्था एवं संस्कृति का विराट संगम: कुम्भ

तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृृश्य सरस्वती के संगम पर चार फरवरी से चार मार्च 2019 तक अर्धकुम्भ का आयोजन किया रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भव्य एवं विशाल तैयारियों को देखते हुए इस आयोजन की छटा पूर्णकुम्भ से कम नहीं होगी। यूनेस्को की सूची में शामिल कुम्भ का लोगो यानी प्रतीक चिह्न भी जारी किया जा चुका है और स्नान की तिथियां घोषित हो चुकी हैं।

कुम्भ पौराणिक काल से चली आ रही विशिष्ट भारतीय परम्परा है, जो भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी पर्यन्त भारत ही नहीं बल्कि विश्व के श्रद्धालुओं, सन्तों, साधकों एवं सम्प्रदायाचार्यों को स्वतः स्फूर्त ढंग से खींच लाता है। कुम्भ विश्व का सबसे बड़ा समागम है। जहाँं दुनियाभर से धर्म जिज्ञासु आते हैं। भारतीय संस्कृति में नदियों को मातृवत मानने की परम्परा रही है। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।। गंगा, यमुना, गोदावरी, सिन्धु, कावेरी का जल स्वयं में अमृत है। सूर्य एवं चन्द्र की किरणों का प्रभाव कुम्भीय ग्रहों के संयोग से यह जल अमृत-तुल्य हो जाता है। वास्तव में ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक है - कुम्भ! ज्योतिष गणना के अनुसार चार स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता है। कुम्भ पर्व तीन वर्ष के अन्तराल में क्रमशः हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में प्रत्येक स्थान पर बारह वर्ष के बाद आता है।

तीर्थराज प्रयाग - ज्ञान अर्थात् प्रकाश की दिशा है, यहाँ सूर्य (ज्ञान) का उदय होता है। नासिक दक्षिण दिशा की प्रतीक है। यह यम की दिशा है और तीक्ष्ण प्रकाश से युक्त है। यहाँ ज्ञान विस्तार को प्राप्त होता है। उज्जैन पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ ज्ञान अस्त अर्थात् आत्मसात होता है। हिमालय के समीप उत्तर दिशा में हरिद्वार तपोभूमि का प्रतीक है। यहाँ ज्ञान अदृश्य अर्थात् समाधिस्थ होता है।

प्रयाग शब्द में, ‘प्र’ उपसर्ग है, जो विशेष अथवा श्रेष्ठ का प्रतीक है। ‘याग’ शब्द ‘यज्’ धातु से उत्पन्न हुआ है। जिसका सामान्य अर्थ है-यज्ञ, तप। तप, यज्ञ और ज्ञान साधना की शाश्वत उउर्जा भूमि है-प्रयाग। ब्रह्मपुराण, के अनुसार इस भूमि में निरंतर यज्ञ होते रहे, अतः इस भूमि को प्रयाग कहा गया। प्रयाग यज्ञ, तप और ज्ञान का शाश्वत ऊर्जा क्षेत्र है। वस्तुतः सहस्रों वर्षों के यज्ञ, तप, योग एवं साधना से प्रयाग का निर्माण होता है। विश्व की कोई सरकार प्रयागराज का निर्माण नहीं कर सकती। अपितु स्वयं ब्रह्माजी ने प्रकृति के माध्यम से इसका निर्माण करवाया है। पुराणों ने इसे प्रजापति ब्रह्मा का क्षेत्र कहा गया है। यह भारतीय संस्कृति, आस्था, धर्म, दर्शन, योग-यज्ञ की भूमि है। प्रयागराज शब्द हमारी संस्कृति और परम्परा की अनुभूति कराता है। महाभारत में प्रयाग को सोम, वरुण एवं प्रजापति का केन्द्र कहा गया है। महर्षि वाल्मीकि ने प्रयाग के संदर्भ में रामायण में भरद्वाज मुनि के आश्रम, गुरुकुल, अक्षयवट आदि का सुंदर वर्णन किया है। तुलसीदास ने इसकी महिमा करते हुए ‘मानस’ में लिखा है- छेत्रु अगम गढ़ गाढ़ सुहावा। सपनेहु नहि प्रतिपक्षिन भावा।। को कहि सकइ प्रयोग प्रभाउउ।

गोस्वामी जी ने मानस में तीर्थो के राजा का अनुपम सुंदर चित्र खींचा है। प्रयागराज सब तीर्थो के राजा हैं इसलिए समस्त तीर्थ यहाँ आकर इनकी उपासना करते हैं। यहीं पर अक्षय वट है्र जिसका क्षय प्रलयकाल में भी नहीं होता है। प्रलय के समय इसी अक्षयवट पर बाल मुकुंद भगवान छोटे शिशु का रूप धारणकर अपने चरण के अंगूठे को मुख में देकर क्रीड़ा करते हैं। इसलिए इस अक्षयवट के दर्शन का भी अनंत फल है। प्रयाग भगवान शिव का भी क्षेत्र है। भगवान विष्णु तो अक्षयवट पर नित्य निवास करते हैं। यहाँ भगवान माधव का मुख्य क्षेत्र है। यहीं पर माधव जी वारह रूप धारणकर रहते हैं। अयोध्या, मथुरा, मायावती, काशी, कांची, उज्जैन, और द्वारका ये सात परम पवित्र नगरी मानी जाती हैं। अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका।।

यहाँ माघ मकर में प्रतिवर्ष एक महीने का बड़ा मेला लगता है। महर्षि भरद्वाज का पावन आश्रम भी यहीं स्थित था। यहीं से रामचरित मानस की सुरसरि धारा प्रवाहित हुई है, जिसने समस्त संसार को भक्ति रस में डुबा दिया है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस के आरम्भ में लिखते हैं -
माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिवेनी।
पूजहिं माधव पद जल जाता, परसि अक्षयवट हरषहिं गाता।
भरद्वाज आश्रम अति पावन, परम रम्य मुनिवर मनभावन।

बृहस्पति के मेष राशि में एवं सूर्य व चन्द्र के मकर राशि में प्रविष्ट होने पर अमावस्या के दिन प्रयाग में कुम्भ पर्व का योग बनता है-
मेष राशि गते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ। अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके।।
दूसरे विकल्प के अनुसार बृहस्पति के वृषभ राशि में एवं सूर्य के मकर राशि में आने से भी प्रयाग में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है-
मकरे च दिवा नाथे ह्यजगे च बृहस्पतौ। कुम्भ योगोभवेत्तत्र प्रयागे ह्ययाति दुलर्भः।।

ज्योतिष एवं खगोलीय मान्यता के अनुसार सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि सात ग्रह हैं। राहु एवं केतु मात्र दो बिन्दु हैं। सौर मण्डलीय चक्र में ग्रह भिन्न-भिन्न गतियों में अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करते हैं। ग्रहों द्वारा अक्ष पर चक्कर लगाने में अलग-अलग समय लगने के कारण सूर्य की परिक्रमा करने में भी अन्तर आ जाता है। इसलिए विभिन्न राशियों में इनके प्रवेश का समय भिन्न-भिन्न है। सतत् गति के कारण ग्रह अलग-अलग या समूहों में भिन्न-भिन्न राशियों में स्थित होते हैं, जिस कारण ऐसे दुर्लभ योग बनते हैं। कुम्भीय चक्र भी इसी पर आधारित है।

अमृत बिन्दु पतन के समय जिन राशियों में सूर्य, चन्द्र एवं गुरु की स्थिति रही उन्हीं राशियों में सूर्य, चन्द्र एवं गुरु के संयोग होने पर कुम्भ पर्व होता है। इन योगों के अभाव में कुम्भ पर्व नहीं हो सकता। देवताओं के बारह दिन और मनुष्यों के बारह वर्षों में कुल बारह कुम्भ पर्व होते है। पृथ्वी पर मनुष्यों के चार तथा आठ कुम्भ पर्व लोकोत्तर में देवताओं के होते हैं। ज्योतिष गणना क्रम में सूर्य एवं चन्द्र का योग तो प्रतिवर्ष होता है केवल गुरु की बारह वर्ष प्रतीक्षा करनी होती है।

सामान्यतः कुम्भ का अर्थ घड़ा होता है परन्तु इसका तात्विक अर्थ कुछ और ही है। घड़े के अर्थ में भी यह लोकजीवन के माँगलिक कार्याें का पर्याय बन गया है। हिन्दू संस्कृति में कोई भी माँगलिक कार्य बिना ‘कलश’ के सम्भव नहीं होता और यह कलश घड़ा अर्थात् कुम्भ का प्रतीक है। इस श्लोक से कलशरूपी कुम्भ का महत्व स्पष्ट हो जाता है -
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीप वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदो सामवेदो अथर्वणः।
अंगश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।।
अर्थात् कलश के मुख में विष्णु कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा, मध्य में मातृगण, अन्तस्थल में समस्त सागर, पृथ्वी में निहित सप्तद्वीप, चारों वेदों का समन्वयात्मक स्वरूप विद्यमान है।

कुम्भ सदा-सर्वदा से पूज्य रहा है। इसे पाप-पुण्य, पुरुषार्थचतुष्ट्य एवं लोकजीवन में मंगल की कामना से जोड़ा गया है। कुम्भ के अनेक पर्याय हैं। कुम्भ का अर्थ है - घट, शरीर, पेट, कुम्भ, समुद्र, पृथ्वी, सूर्य एवं विष्णु। घट, समुद्र, नदी, सरोवर, कूप आदि सभी कुम्भ के प्रतीक हैं। कुम्भ हमारी समस्त संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ एक आध्यात्मिक चेतना है, कुम्भ संस्कृति का प्रवाह है। पवित्र नदियाँ मानव जीवन की समरसता की प्रतीक हैं एवं मानव जीवन में प्रवाहित होने वाले जल तत्व का बोध कराती हैं। शरीररूपी घर में पंचतत्व के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी एवं आकाश तत्व यही शरीररूपी घट है। इसी को निर्गुणोपासक सन्त कबीर ने ‘फूटा कुम्भ जल जलहिं समाना’ कहकर स्पष्ट किया है।
कुम्भ में समस्त तीर्थ, देव एवं समस्त भूत समाहित हैं- देवदानव संवादे मध्यमामाने महीदधौ। उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृतों विष्णुना स्वयम्।’

कुम्भ शब्द का सम्बन्ध पौराणिक आख्यानों के आधार पर देव-दानव संवाद से स्थापित किया गया है। किन्तु लौकिक जीवन में यदि कुम्भ को उत्तर एवं दक्षिण भारत का सेतु कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। कुम्भ पर्व दक्षिण भारत में कुम्भ कोणम’ के नाम से लोकप्रिय है। प्रयाग में माघ मेले की ही भाँति प्रतिवर्ष सामान्य मुखम् उत्सव तथा बारह वर्षों में महामखम् उत्सव मनाया जाता है। जिसमें पूरे देशभर से लोग आते हैं। लाखों लोग यहाँ महामुखम् तालाब में स्नान करते हैं और दक्षिण भारत का कुम्भ पर्व मनाते हैं। ‘कुम्भ कोणम’ का संस्कृत नाम ‘कुम्भ घोणम्’ है। पुराणों में कथा आती है कि ब्रह्माजी ने अमृत भरकर एक कुम्भ रखा था उस कुम्भ की नासिका (कोण) अर्थात् मुख के समीप एक छिद्र मे से अमृत रिसकर बाहर निकल गया और उससे वहाँ की पाँच कोस तक की जमीन भीग गई। इसी से उसका नाम ‘कुम्भ कोण’ पड़ गया।
कुम्भस्य घोणतौ यस्मिन सुधापूरं निविस्सृतम्।
तस्मात तत्पदं लोके कुम्भ कोण वदन्ति हि।।

कुम्भ कोण का यह स्थान चिदम्बरम् के समीप है।

कुम्भ से सम्बन्धित अमृत मंथन की कथा पुराणों के माध्यम से जनमानस में अधिक लोकप्रिय है। देवासुर संग्राम की यह कथा दैवी एवं आसुरी शक्ति के परस्पर द्वन्द्व का प्रतीक है। देव-दानवों द्वारा परस्पर सहयोग से किए गए सागर-मंथन से चैदह रत्न निकले थे। सारे रत्न देवताओं ने आपस में बाँट लिए। अन्त में भगवान धन्वन्तरि अमृत-कुम्भ लेकर प्रकट हुये। दोनों ओर खींचतान मच गई। भगवान विष्णु ने इस संकट को टालने के लिए स्वयं मोहिनी रूप धारण किया और सबको अमृतपान कराने की बात कही। अमृतपान से पूर्व ही अमृत के लिए देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने इन्द्रपुत्र जयन्त को अमृत कलश सौंपा। उसकी रक्षा का भार उन्होंने सूर्य, चन्द्र एवं बृहस्पति को दिया। सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया, चन्द्र ने अमृत को छलकने से एवं बृहस्पति ने उसे भूमि पर गिरने से बचाया।

जयन्त द्वारा अमृत कलश लेकर भागने के क्रम में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में अमृत कलश से अमृत की बूँदे छलकने के कारण ये स्थल मुख्य तीर्थ बन गये। इन स्थानों पर सूर्य, चन्द्र एवं बृहस्पति तथा कुम्भ, मेष एवं सिंह राशियाँ कुम्भपर्व का द्योतक बन गयीं और ग्रहों की संयोग के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व बन गया। जयन्त को अमृत कलश स्वर्ग ले जाने में बारह दिन का समय लगा था। देवों का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि ग्रहीय स्थिति के क्रम में कुम्भ पर्व बारह वर्ष बाद लगता है। यह पर्व ही मेले का पर्याय है, जो जनसामान्य में कुम्भ मेला के रूप में प्रचलित है। 

Thursday, April 21, 2011

सुखी दांपत्य जीवन का मूल - विवाह के समय लिए गए सात वचन

विवाह समय पति द्वारा पत्नि को दिए जाने वाले सात वचनों के महत्व को देखते हुए यहाँ उन वचनों के बारे में कुछ जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ. यदि आज भी इनके महत्व को समझ लिया जाता है तो दाम्पत्य सम्बन्धों में उत्पन अनेक समस्यायों का समाधान स्वत: ही हो जाएगा.
1.तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!
यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना. कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांती ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है. जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है.पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है.
2.पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृ्ष्टि का आभास होता है. आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है--गृ्हस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है. उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए.
3.जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं(युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ)
4.कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे. अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ती का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ )
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती हैं. विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु प्रयाप्त धन की आवश्यकता होती है. अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऎसी स्थिति में गृ्हस्थी भला कैसे चल पाएगी. इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ती में सक्षम हो सके. इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो प्रयाप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे.
5.स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है. वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है. बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नि से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते. अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नि से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नि का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है.
6.न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!
(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें. यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं. विवाह पश्चात कुछ पुरूषों का व्यवहार बदलने लगता है. वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नि को डाँट-डपट देते हैं. ऎसे व्यवहार से बेचारी पत्नि का मन कितना आहत होता होगा. यहाँ पत्नि चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्ही दुर्वसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले.
7.परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है--ये आप सब भली भान्ती से जानते हैं. इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है.
देखा आपने कि किस प्रकार ईश्वर को साक्षी मानकर किए गए इन सप्त संकल्प रूपी स्तम्भों पर सुखी गृ्हस्थ जीवन का भार टिका हुआ है...

श्रद्धा समर्पण