तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृृश्य सरस्वती के संगम पर चार फरवरी से चार मार्च 2019 तक अर्धकुम्भ का आयोजन किया रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भव्य एवं विशाल तैयारियों को देखते हुए इस आयोजन की छटा पूर्णकुम्भ से कम नहीं होगी। यूनेस्को की सूची में शामिल कुम्भ का लोगो यानी प्रतीक चिह्न भी जारी किया जा चुका है और स्नान की तिथियां घोषित हो चुकी हैं।
कुम्भ पौराणिक काल से चली आ रही विशिष्ट भारतीय परम्परा है, जो भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी पर्यन्त भारत ही नहीं बल्कि विश्व के श्रद्धालुओं, सन्तों, साधकों एवं सम्प्रदायाचार्यों को स्वतः स्फूर्त ढंग से खींच लाता है। कुम्भ विश्व का सबसे बड़ा समागम है। जहाँं दुनियाभर से धर्म जिज्ञासु आते हैं। भारतीय संस्कृति में नदियों को मातृवत मानने की परम्परा रही है। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।। गंगा, यमुना, गोदावरी, सिन्धु, कावेरी का जल स्वयं में अमृत है। सूर्य एवं चन्द्र की किरणों का प्रभाव कुम्भीय ग्रहों के संयोग से यह जल अमृत-तुल्य हो जाता है। वास्तव में ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक है - कुम्भ! ज्योतिष गणना के अनुसार चार स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता है। कुम्भ पर्व तीन वर्ष के अन्तराल में क्रमशः हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में प्रत्येक स्थान पर बारह वर्ष के बाद आता है।
तीर्थराज प्रयाग - ज्ञान अर्थात् प्रकाश की दिशा है, यहाँ सूर्य (ज्ञान) का उदय होता है। नासिक दक्षिण दिशा की प्रतीक है। यह यम की दिशा है और तीक्ष्ण प्रकाश से युक्त है। यहाँ ज्ञान विस्तार को प्राप्त होता है। उज्जैन पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ ज्ञान अस्त अर्थात् आत्मसात होता है। हिमालय के समीप उत्तर दिशा में हरिद्वार तपोभूमि का प्रतीक है। यहाँ ज्ञान अदृश्य अर्थात् समाधिस्थ होता है।
प्रयाग शब्द में, ‘प्र’ उपसर्ग है, जो विशेष अथवा श्रेष्ठ का प्रतीक है। ‘याग’ शब्द ‘यज्’ धातु से उत्पन्न हुआ है। जिसका सामान्य अर्थ है-यज्ञ, तप। तप, यज्ञ और ज्ञान साधना की शाश्वत उउर्जा भूमि है-प्रयाग। ब्रह्मपुराण, के अनुसार इस भूमि में निरंतर यज्ञ होते रहे, अतः इस भूमि को प्रयाग कहा गया। प्रयाग यज्ञ, तप और ज्ञान का शाश्वत ऊर्जा क्षेत्र है। वस्तुतः सहस्रों वर्षों के यज्ञ, तप, योग एवं साधना से प्रयाग का निर्माण होता है। विश्व की कोई सरकार प्रयागराज का निर्माण नहीं कर सकती। अपितु स्वयं ब्रह्माजी ने प्रकृति के माध्यम से इसका निर्माण करवाया है। पुराणों ने इसे प्रजापति ब्रह्मा का क्षेत्र कहा गया है। यह भारतीय संस्कृति, आस्था, धर्म, दर्शन, योग-यज्ञ की भूमि है। प्रयागराज शब्द हमारी संस्कृति और परम्परा की अनुभूति कराता है। महाभारत में प्रयाग को सोम, वरुण एवं प्रजापति का केन्द्र कहा गया है। महर्षि वाल्मीकि ने प्रयाग के संदर्भ में रामायण में भरद्वाज मुनि के आश्रम, गुरुकुल, अक्षयवट आदि का सुंदर वर्णन किया है। तुलसीदास ने इसकी महिमा करते हुए ‘मानस’ में लिखा है- छेत्रु अगम गढ़ गाढ़ सुहावा। सपनेहु नहि प्रतिपक्षिन भावा।। को कहि सकइ प्रयोग प्रभाउउ।
गोस्वामी जी ने मानस में तीर्थो के राजा का अनुपम सुंदर चित्र खींचा है। प्रयागराज सब तीर्थो के राजा हैं इसलिए समस्त तीर्थ यहाँ आकर इनकी उपासना करते हैं। यहीं पर अक्षय वट है्र जिसका क्षय प्रलयकाल में भी नहीं होता है। प्रलय के समय इसी अक्षयवट पर बाल मुकुंद भगवान छोटे शिशु का रूप धारणकर अपने चरण के अंगूठे को मुख में देकर क्रीड़ा करते हैं। इसलिए इस अक्षयवट के दर्शन का भी अनंत फल है। प्रयाग भगवान शिव का भी क्षेत्र है। भगवान विष्णु तो अक्षयवट पर नित्य निवास करते हैं। यहाँ भगवान माधव का मुख्य क्षेत्र है। यहीं पर माधव जी वारह रूप धारणकर रहते हैं। अयोध्या, मथुरा, मायावती, काशी, कांची, उज्जैन, और द्वारका ये सात परम पवित्र नगरी मानी जाती हैं। अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका।।
यहाँ माघ मकर में प्रतिवर्ष एक महीने का बड़ा मेला लगता है। महर्षि भरद्वाज का पावन आश्रम भी यहीं स्थित था। यहीं से रामचरित मानस की सुरसरि धारा प्रवाहित हुई है, जिसने समस्त संसार को भक्ति रस में डुबा दिया है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस के आरम्भ में लिखते हैं -
माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिवेनी।
पूजहिं माधव पद जल जाता, परसि अक्षयवट हरषहिं गाता।
भरद्वाज आश्रम अति पावन, परम रम्य मुनिवर मनभावन।
बृहस्पति के मेष राशि में एवं सूर्य व चन्द्र के मकर राशि में प्रविष्ट होने पर अमावस्या के दिन प्रयाग में कुम्भ पर्व का योग बनता है-
मेष राशि गते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ। अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके।।
दूसरे विकल्प के अनुसार बृहस्पति के वृषभ राशि में एवं सूर्य के मकर राशि में आने से भी प्रयाग में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है-
मकरे च दिवा नाथे ह्यजगे च बृहस्पतौ। कुम्भ योगोभवेत्तत्र प्रयागे ह्ययाति दुलर्भः।।
ज्योतिष एवं खगोलीय मान्यता के अनुसार सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि सात ग्रह हैं। राहु एवं केतु मात्र दो बिन्दु हैं। सौर मण्डलीय चक्र में ग्रह भिन्न-भिन्न गतियों में अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करते हैं। ग्रहों द्वारा अक्ष पर चक्कर लगाने में अलग-अलग समय लगने के कारण सूर्य की परिक्रमा करने में भी अन्तर आ जाता है। इसलिए विभिन्न राशियों में इनके प्रवेश का समय भिन्न-भिन्न है। सतत् गति के कारण ग्रह अलग-अलग या समूहों में भिन्न-भिन्न राशियों में स्थित होते हैं, जिस कारण ऐसे दुर्लभ योग बनते हैं। कुम्भीय चक्र भी इसी पर आधारित है।
अमृत बिन्दु पतन के समय जिन राशियों में सूर्य, चन्द्र एवं गुरु की स्थिति रही उन्हीं राशियों में सूर्य, चन्द्र एवं गुरु के संयोग होने पर कुम्भ पर्व होता है। इन योगों के अभाव में कुम्भ पर्व नहीं हो सकता। देवताओं के बारह दिन और मनुष्यों के बारह वर्षों में कुल बारह कुम्भ पर्व होते है। पृथ्वी पर मनुष्यों के चार तथा आठ कुम्भ पर्व लोकोत्तर में देवताओं के होते हैं। ज्योतिष गणना क्रम में सूर्य एवं चन्द्र का योग तो प्रतिवर्ष होता है केवल गुरु की बारह वर्ष प्रतीक्षा करनी होती है।
सामान्यतः कुम्भ का अर्थ घड़ा होता है परन्तु इसका तात्विक अर्थ कुछ और ही है। घड़े के अर्थ में भी यह लोकजीवन के माँगलिक कार्याें का पर्याय बन गया है। हिन्दू संस्कृति में कोई भी माँगलिक कार्य बिना ‘कलश’ के सम्भव नहीं होता और यह कलश घड़ा अर्थात् कुम्भ का प्रतीक है। इस श्लोक से कलशरूपी कुम्भ का महत्व स्पष्ट हो जाता है -
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीप वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदो सामवेदो अथर्वणः।
अंगश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।।
अर्थात् कलश के मुख में विष्णु कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा, मध्य में मातृगण, अन्तस्थल में समस्त सागर, पृथ्वी में निहित सप्तद्वीप, चारों वेदों का समन्वयात्मक स्वरूप विद्यमान है।
कुम्भ सदा-सर्वदा से पूज्य रहा है। इसे पाप-पुण्य, पुरुषार्थचतुष्ट्य एवं लोकजीवन में मंगल की कामना से जोड़ा गया है। कुम्भ के अनेक पर्याय हैं। कुम्भ का अर्थ है - घट, शरीर, पेट, कुम्भ, समुद्र, पृथ्वी, सूर्य एवं विष्णु। घट, समुद्र, नदी, सरोवर, कूप आदि सभी कुम्भ के प्रतीक हैं। कुम्भ हमारी समस्त संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ एक आध्यात्मिक चेतना है, कुम्भ संस्कृति का प्रवाह है। पवित्र नदियाँ मानव जीवन की समरसता की प्रतीक हैं एवं मानव जीवन में प्रवाहित होने वाले जल तत्व का बोध कराती हैं। शरीररूपी घर में पंचतत्व के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी एवं आकाश तत्व यही शरीररूपी घट है। इसी को निर्गुणोपासक सन्त कबीर ने ‘फूटा कुम्भ जल जलहिं समाना’ कहकर स्पष्ट किया है।
कुम्भ में समस्त तीर्थ, देव एवं समस्त भूत समाहित हैं- देवदानव संवादे मध्यमामाने महीदधौ। उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृतों विष्णुना स्वयम्।’
कुम्भ शब्द का सम्बन्ध पौराणिक आख्यानों के आधार पर देव-दानव संवाद से स्थापित किया गया है। किन्तु लौकिक जीवन में यदि कुम्भ को उत्तर एवं दक्षिण भारत का सेतु कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। कुम्भ पर्व दक्षिण भारत में कुम्भ कोणम’ के नाम से लोकप्रिय है। प्रयाग में माघ मेले की ही भाँति प्रतिवर्ष सामान्य मुखम् उत्सव तथा बारह वर्षों में महामखम् उत्सव मनाया जाता है। जिसमें पूरे देशभर से लोग आते हैं। लाखों लोग यहाँ महामुखम् तालाब में स्नान करते हैं और दक्षिण भारत का कुम्भ पर्व मनाते हैं। ‘कुम्भ कोणम’ का संस्कृत नाम ‘कुम्भ घोणम्’ है। पुराणों में कथा आती है कि ब्रह्माजी ने अमृत भरकर एक कुम्भ रखा था उस कुम्भ की नासिका (कोण) अर्थात् मुख के समीप एक छिद्र मे से अमृत रिसकर बाहर निकल गया और उससे वहाँ की पाँच कोस तक की जमीन भीग गई। इसी से उसका नाम ‘कुम्भ कोण’ पड़ गया।
कुम्भस्य घोणतौ यस्मिन सुधापूरं निविस्सृतम्।
तस्मात तत्पदं लोके कुम्भ कोण वदन्ति हि।।
कुम्भ कोण का यह स्थान चिदम्बरम् के समीप है।
कुम्भ से सम्बन्धित अमृत मंथन की कथा पुराणों के माध्यम से जनमानस में अधिक लोकप्रिय है। देवासुर संग्राम की यह कथा दैवी एवं आसुरी शक्ति के परस्पर द्वन्द्व का प्रतीक है। देव-दानवों द्वारा परस्पर सहयोग से किए गए सागर-मंथन से चैदह रत्न निकले थे। सारे रत्न देवताओं ने आपस में बाँट लिए। अन्त में भगवान धन्वन्तरि अमृत-कुम्भ लेकर प्रकट हुये। दोनों ओर खींचतान मच गई। भगवान विष्णु ने इस संकट को टालने के लिए स्वयं मोहिनी रूप धारण किया और सबको अमृतपान कराने की बात कही। अमृतपान से पूर्व ही अमृत के लिए देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने इन्द्रपुत्र जयन्त को अमृत कलश सौंपा। उसकी रक्षा का भार उन्होंने सूर्य, चन्द्र एवं बृहस्पति को दिया। सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया, चन्द्र ने अमृत को छलकने से एवं बृहस्पति ने उसे भूमि पर गिरने से बचाया।
जयन्त द्वारा अमृत कलश लेकर भागने के क्रम में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में अमृत कलश से अमृत की बूँदे छलकने के कारण ये स्थल मुख्य तीर्थ बन गये। इन स्थानों पर सूर्य, चन्द्र एवं बृहस्पति तथा कुम्भ, मेष एवं सिंह राशियाँ कुम्भपर्व का द्योतक बन गयीं और ग्रहों की संयोग के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व बन गया। जयन्त को अमृत कलश स्वर्ग ले जाने में बारह दिन का समय लगा था। देवों का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि ग्रहीय स्थिति के क्रम में कुम्भ पर्व बारह वर्ष बाद लगता है। यह पर्व ही मेले का पर्याय है, जो जनसामान्य में कुम्भ मेला के रूप में प्रचलित है।
कुम्भ पौराणिक काल से चली आ रही विशिष्ट भारतीय परम्परा है, जो भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी पर्यन्त भारत ही नहीं बल्कि विश्व के श्रद्धालुओं, सन्तों, साधकों एवं सम्प्रदायाचार्यों को स्वतः स्फूर्त ढंग से खींच लाता है। कुम्भ विश्व का सबसे बड़ा समागम है। जहाँं दुनियाभर से धर्म जिज्ञासु आते हैं। भारतीय संस्कृति में नदियों को मातृवत मानने की परम्परा रही है। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।। गंगा, यमुना, गोदावरी, सिन्धु, कावेरी का जल स्वयं में अमृत है। सूर्य एवं चन्द्र की किरणों का प्रभाव कुम्भीय ग्रहों के संयोग से यह जल अमृत-तुल्य हो जाता है। वास्तव में ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक है - कुम्भ! ज्योतिष गणना के अनुसार चार स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता है। कुम्भ पर्व तीन वर्ष के अन्तराल में क्रमशः हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में प्रत्येक स्थान पर बारह वर्ष के बाद आता है।
तीर्थराज प्रयाग - ज्ञान अर्थात् प्रकाश की दिशा है, यहाँ सूर्य (ज्ञान) का उदय होता है। नासिक दक्षिण दिशा की प्रतीक है। यह यम की दिशा है और तीक्ष्ण प्रकाश से युक्त है। यहाँ ज्ञान विस्तार को प्राप्त होता है। उज्जैन पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ ज्ञान अस्त अर्थात् आत्मसात होता है। हिमालय के समीप उत्तर दिशा में हरिद्वार तपोभूमि का प्रतीक है। यहाँ ज्ञान अदृश्य अर्थात् समाधिस्थ होता है।
प्रयाग शब्द में, ‘प्र’ उपसर्ग है, जो विशेष अथवा श्रेष्ठ का प्रतीक है। ‘याग’ शब्द ‘यज्’ धातु से उत्पन्न हुआ है। जिसका सामान्य अर्थ है-यज्ञ, तप। तप, यज्ञ और ज्ञान साधना की शाश्वत उउर्जा भूमि है-प्रयाग। ब्रह्मपुराण, के अनुसार इस भूमि में निरंतर यज्ञ होते रहे, अतः इस भूमि को प्रयाग कहा गया। प्रयाग यज्ञ, तप और ज्ञान का शाश्वत ऊर्जा क्षेत्र है। वस्तुतः सहस्रों वर्षों के यज्ञ, तप, योग एवं साधना से प्रयाग का निर्माण होता है। विश्व की कोई सरकार प्रयागराज का निर्माण नहीं कर सकती। अपितु स्वयं ब्रह्माजी ने प्रकृति के माध्यम से इसका निर्माण करवाया है। पुराणों ने इसे प्रजापति ब्रह्मा का क्षेत्र कहा गया है। यह भारतीय संस्कृति, आस्था, धर्म, दर्शन, योग-यज्ञ की भूमि है। प्रयागराज शब्द हमारी संस्कृति और परम्परा की अनुभूति कराता है। महाभारत में प्रयाग को सोम, वरुण एवं प्रजापति का केन्द्र कहा गया है। महर्षि वाल्मीकि ने प्रयाग के संदर्भ में रामायण में भरद्वाज मुनि के आश्रम, गुरुकुल, अक्षयवट आदि का सुंदर वर्णन किया है। तुलसीदास ने इसकी महिमा करते हुए ‘मानस’ में लिखा है- छेत्रु अगम गढ़ गाढ़ सुहावा। सपनेहु नहि प्रतिपक्षिन भावा।। को कहि सकइ प्रयोग प्रभाउउ।
गोस्वामी जी ने मानस में तीर्थो के राजा का अनुपम सुंदर चित्र खींचा है। प्रयागराज सब तीर्थो के राजा हैं इसलिए समस्त तीर्थ यहाँ आकर इनकी उपासना करते हैं। यहीं पर अक्षय वट है्र जिसका क्षय प्रलयकाल में भी नहीं होता है। प्रलय के समय इसी अक्षयवट पर बाल मुकुंद भगवान छोटे शिशु का रूप धारणकर अपने चरण के अंगूठे को मुख में देकर क्रीड़ा करते हैं। इसलिए इस अक्षयवट के दर्शन का भी अनंत फल है। प्रयाग भगवान शिव का भी क्षेत्र है। भगवान विष्णु तो अक्षयवट पर नित्य निवास करते हैं। यहाँ भगवान माधव का मुख्य क्षेत्र है। यहीं पर माधव जी वारह रूप धारणकर रहते हैं। अयोध्या, मथुरा, मायावती, काशी, कांची, उज्जैन, और द्वारका ये सात परम पवित्र नगरी मानी जाती हैं। अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका।।
यहाँ माघ मकर में प्रतिवर्ष एक महीने का बड़ा मेला लगता है। महर्षि भरद्वाज का पावन आश्रम भी यहीं स्थित था। यहीं से रामचरित मानस की सुरसरि धारा प्रवाहित हुई है, जिसने समस्त संसार को भक्ति रस में डुबा दिया है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस के आरम्भ में लिखते हैं -
माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिवेनी।
पूजहिं माधव पद जल जाता, परसि अक्षयवट हरषहिं गाता।
भरद्वाज आश्रम अति पावन, परम रम्य मुनिवर मनभावन।
बृहस्पति के मेष राशि में एवं सूर्य व चन्द्र के मकर राशि में प्रविष्ट होने पर अमावस्या के दिन प्रयाग में कुम्भ पर्व का योग बनता है-
मेष राशि गते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ। अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके।।
दूसरे विकल्प के अनुसार बृहस्पति के वृषभ राशि में एवं सूर्य के मकर राशि में आने से भी प्रयाग में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है-
मकरे च दिवा नाथे ह्यजगे च बृहस्पतौ। कुम्भ योगोभवेत्तत्र प्रयागे ह्ययाति दुलर्भः।।
ज्योतिष एवं खगोलीय मान्यता के अनुसार सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि सात ग्रह हैं। राहु एवं केतु मात्र दो बिन्दु हैं। सौर मण्डलीय चक्र में ग्रह भिन्न-भिन्न गतियों में अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करते हैं। ग्रहों द्वारा अक्ष पर चक्कर लगाने में अलग-अलग समय लगने के कारण सूर्य की परिक्रमा करने में भी अन्तर आ जाता है। इसलिए विभिन्न राशियों में इनके प्रवेश का समय भिन्न-भिन्न है। सतत् गति के कारण ग्रह अलग-अलग या समूहों में भिन्न-भिन्न राशियों में स्थित होते हैं, जिस कारण ऐसे दुर्लभ योग बनते हैं। कुम्भीय चक्र भी इसी पर आधारित है।
अमृत बिन्दु पतन के समय जिन राशियों में सूर्य, चन्द्र एवं गुरु की स्थिति रही उन्हीं राशियों में सूर्य, चन्द्र एवं गुरु के संयोग होने पर कुम्भ पर्व होता है। इन योगों के अभाव में कुम्भ पर्व नहीं हो सकता। देवताओं के बारह दिन और मनुष्यों के बारह वर्षों में कुल बारह कुम्भ पर्व होते है। पृथ्वी पर मनुष्यों के चार तथा आठ कुम्भ पर्व लोकोत्तर में देवताओं के होते हैं। ज्योतिष गणना क्रम में सूर्य एवं चन्द्र का योग तो प्रतिवर्ष होता है केवल गुरु की बारह वर्ष प्रतीक्षा करनी होती है।
सामान्यतः कुम्भ का अर्थ घड़ा होता है परन्तु इसका तात्विक अर्थ कुछ और ही है। घड़े के अर्थ में भी यह लोकजीवन के माँगलिक कार्याें का पर्याय बन गया है। हिन्दू संस्कृति में कोई भी माँगलिक कार्य बिना ‘कलश’ के सम्भव नहीं होता और यह कलश घड़ा अर्थात् कुम्भ का प्रतीक है। इस श्लोक से कलशरूपी कुम्भ का महत्व स्पष्ट हो जाता है -
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीप वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदो सामवेदो अथर्वणः।
अंगश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।।
अर्थात् कलश के मुख में विष्णु कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा, मध्य में मातृगण, अन्तस्थल में समस्त सागर, पृथ्वी में निहित सप्तद्वीप, चारों वेदों का समन्वयात्मक स्वरूप विद्यमान है।
कुम्भ सदा-सर्वदा से पूज्य रहा है। इसे पाप-पुण्य, पुरुषार्थचतुष्ट्य एवं लोकजीवन में मंगल की कामना से जोड़ा गया है। कुम्भ के अनेक पर्याय हैं। कुम्भ का अर्थ है - घट, शरीर, पेट, कुम्भ, समुद्र, पृथ्वी, सूर्य एवं विष्णु। घट, समुद्र, नदी, सरोवर, कूप आदि सभी कुम्भ के प्रतीक हैं। कुम्भ हमारी समस्त संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ एक आध्यात्मिक चेतना है, कुम्भ संस्कृति का प्रवाह है। पवित्र नदियाँ मानव जीवन की समरसता की प्रतीक हैं एवं मानव जीवन में प्रवाहित होने वाले जल तत्व का बोध कराती हैं। शरीररूपी घर में पंचतत्व के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी एवं आकाश तत्व यही शरीररूपी घट है। इसी को निर्गुणोपासक सन्त कबीर ने ‘फूटा कुम्भ जल जलहिं समाना’ कहकर स्पष्ट किया है।
कुम्भ में समस्त तीर्थ, देव एवं समस्त भूत समाहित हैं- देवदानव संवादे मध्यमामाने महीदधौ। उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृतों विष्णुना स्वयम्।’
कुम्भ शब्द का सम्बन्ध पौराणिक आख्यानों के आधार पर देव-दानव संवाद से स्थापित किया गया है। किन्तु लौकिक जीवन में यदि कुम्भ को उत्तर एवं दक्षिण भारत का सेतु कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। कुम्भ पर्व दक्षिण भारत में कुम्भ कोणम’ के नाम से लोकप्रिय है। प्रयाग में माघ मेले की ही भाँति प्रतिवर्ष सामान्य मुखम् उत्सव तथा बारह वर्षों में महामखम् उत्सव मनाया जाता है। जिसमें पूरे देशभर से लोग आते हैं। लाखों लोग यहाँ महामुखम् तालाब में स्नान करते हैं और दक्षिण भारत का कुम्भ पर्व मनाते हैं। ‘कुम्भ कोणम’ का संस्कृत नाम ‘कुम्भ घोणम्’ है। पुराणों में कथा आती है कि ब्रह्माजी ने अमृत भरकर एक कुम्भ रखा था उस कुम्भ की नासिका (कोण) अर्थात् मुख के समीप एक छिद्र मे से अमृत रिसकर बाहर निकल गया और उससे वहाँ की पाँच कोस तक की जमीन भीग गई। इसी से उसका नाम ‘कुम्भ कोण’ पड़ गया।
कुम्भस्य घोणतौ यस्मिन सुधापूरं निविस्सृतम्।
तस्मात तत्पदं लोके कुम्भ कोण वदन्ति हि।।
कुम्भ कोण का यह स्थान चिदम्बरम् के समीप है।
कुम्भ से सम्बन्धित अमृत मंथन की कथा पुराणों के माध्यम से जनमानस में अधिक लोकप्रिय है। देवासुर संग्राम की यह कथा दैवी एवं आसुरी शक्ति के परस्पर द्वन्द्व का प्रतीक है। देव-दानवों द्वारा परस्पर सहयोग से किए गए सागर-मंथन से चैदह रत्न निकले थे। सारे रत्न देवताओं ने आपस में बाँट लिए। अन्त में भगवान धन्वन्तरि अमृत-कुम्भ लेकर प्रकट हुये। दोनों ओर खींचतान मच गई। भगवान विष्णु ने इस संकट को टालने के लिए स्वयं मोहिनी रूप धारण किया और सबको अमृतपान कराने की बात कही। अमृतपान से पूर्व ही अमृत के लिए देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने इन्द्रपुत्र जयन्त को अमृत कलश सौंपा। उसकी रक्षा का भार उन्होंने सूर्य, चन्द्र एवं बृहस्पति को दिया। सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया, चन्द्र ने अमृत को छलकने से एवं बृहस्पति ने उसे भूमि पर गिरने से बचाया।
जयन्त द्वारा अमृत कलश लेकर भागने के क्रम में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में अमृत कलश से अमृत की बूँदे छलकने के कारण ये स्थल मुख्य तीर्थ बन गये। इन स्थानों पर सूर्य, चन्द्र एवं बृहस्पति तथा कुम्भ, मेष एवं सिंह राशियाँ कुम्भपर्व का द्योतक बन गयीं और ग्रहों की संयोग के कारण कुम्भ पर्व ज्योतिष का पर्व बन गया। जयन्त को अमृत कलश स्वर्ग ले जाने में बारह दिन का समय लगा था। देवों का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर होता है। यही कारण है कि ग्रहीय स्थिति के क्रम में कुम्भ पर्व बारह वर्ष बाद लगता है। यह पर्व ही मेले का पर्याय है, जो जनसामान्य में कुम्भ मेला के रूप में प्रचलित है।


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